ऐसा आदिवासी समुदाय जहाँ ‘भाई-बहन’ आपस में करते हैं शादी, नहीं तो भरना पड़ता है जुर्माना !

भारत मे छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा आदिवासी समुदाय है। इन्हीं में से एक धुरवा आदिवासी समुदाय है, जिनकी अपनी ही कुछ प्रथाएं और परम्पराएं है। इस समुदाय की एक दिलचस्प प्रथा ये है की इनके यहां रिश्ते मे भाई-बहन, जैसे की ममेरे, फुफेरे भाई बहन की शादी करने का चलन है। और अगर विवाह की इस अनोखी परम्परा को न माना गया तो ऐसा करने वालो से जुर्माना वसूला जाता है।

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धुरवा समुदाय में बाल विवाह प्रथा का भी प्रचलन है। छत्तीसगढ़ में बस्तर की कांगेरघाटी के इर्दगिर्द बसे धुरवा जाति के बेटे-बेटियों की शादी में अग्नि को नहीं बल्कि पानी को साक्षी माना जाता है। इस प्रथा के कारण बेटियों को अनचाहे वर से मजबूरी में विवाह करना पड़ता है। हालांकि, अब ममेरे-फुफेरे, भाई-बहन की शादी को समाज में बंद करने का दबाव डाल रहे है।

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समाज के सचिव गंगाराम कश्यप का कहना है की छत्तीसगढ़ में धुरवा आदिवासियों की स्तिथि कुछ अच्छी नहीं है। रोज़गार की कमी और जंगल में बढ़ते औद्योगिक दखल की वजह से इन आदिवासियों की जाति को खतरा बढ़ने लगा है। इन की हालात को देख कर सरकार ने 2002 में विशेष आरक्षण देने का न तय किया पर उस पर अब तक अमल नहीं किया गया।

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सरकार के कोई कड़े कदम ना उठने के कारण धुरवा आदिवासी धीरे-धीरे जंगल, जल, जमीन का हक भी खो चुके हैं। गुज़ारा करने के लिए अब धुर्वा मज़दूरी दिहाड़ी के लिए भटकते रहते है।अब तो धुरवा आदिवासियों को अपनी बोली, भाषा, संस्कृति, रहन-सहन पर भी खतरे का एहसास होने लगा है।

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छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बॉर्डर पर कुल मिलकर 88 गांवों में धुरवा जनजाति आबाद है।

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ये आदिवासी कोटमसर की गुफाओं के पास रहते हैं। कहते हैं इन गुफाओं में हजारों साल पहले आदिमानव रहा करते थे। धुरवा आदिवासियों के नाच, गीत और इनकी बोली धुरवी कहलाती है।

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